भारत में दूध मिलावट के बारे में
FSSAI के 2019 के सर्वेक्षण में भारत भर के 6,432 नमूनों में पाया गया कि लगभग 37% प्रोसेस्ड दूध और 10% कच्चे दूध के नमूने निर्धारित सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे। सबसे आम समस्याएँ थीं — निर्धारित सीमा से अधिक बैक्टीरिया और मिलाया हुआ पानी या स्टार्च। एक छोटा पर अधिक खतरनाक वर्ग सिंथेटिक दूध का था — डिटर्जेंट, urea, वनस्पति तेल और पानी का ज़हरीला मिश्रण।
ज़्यादातर मिलावट आर्थिक कारणों से होती है — दूधवाले आपूर्ति बढ़ाने के लिए पानी, गाढ़ापन बहाल करने के लिए स्टार्च और खट्टेपन को छुपाने के लिए न्यूट्रलाइज़र मिलाते हैं। ये बेईमानी है पर तुरंत ज़हरीले नहीं। सच में ख़तरनाक मिलावट हैं urea, ammonium sulphate, formalin और डिटर्जेंट — जो केवल बड़े पैमाने पर सिंथेटिक दूध के काम में आते हैं। इनसे किडनी ख़राब होती है, गैस्ट्राइटिस और कैंसर होता है, बच्चों और बुज़ुर्गों को सबसे ज़्यादा नुकसान।
इन परीक्षणों का व्यावहारिक उपयोग कैसे करें
पानी परीक्षण (सबसे आसान, बस एक बूँद टाइल पर) और डिटर्जेंट परीक्षण (पानी से हिलाएँ, झाग देखें) से शुरू करें। ये दोनों 80% मामले पकड़ लेते हैं। अगर दोनों साफ़ हों पर संदेह हो तो स्टार्च और urea की जाँच करें। रासायनिक परीक्षणों (formalin, ammonium sulphate) के लिए असली अभिकर्मक चाहिए और देखरेख में करें।
किसी कानूनी कार्रवाई या बड़े पैमाने पर जाँच के लिए हमेशा FSSAI-मान्यता प्राप्त लैब में नमूना भेजें। यहाँ दिए घरेलू परीक्षण व्यक्तिगत जागरूकता के लिए हैं — इनके परिणाम खाद्य सुरक्षा मामले में मान्य नहीं होंगे।